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एक पंक्ति में
एक विचारक, समाजसेवी और परिवर्तन के लिए समर्पित कर्मयोगी। दशकों से समाज, राजनीति, न्याय, शिक्षा और मानवता के मुद्दों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं।
पूरा परिचय
पंद्रह की उम्र में उन्होंने भरी पंचायत में समाज के ठेकेदारों से कहा था कि आपके निर्णय चाँदी के जूते से प्रभावित होते हैं। बहिष्कार मिला, माफ़ी माँगने को कहा गया — बहिष्कार उन्होंने स्वीकार किया, माफ़ी नहीं माँगी। आपातकाल में फ़रार रहे, जनवादी युवा शक्ति के प्रदेशाध्यक्ष बने, अधिकारियों से रिश्वतें वापस दिलवाईं। फिर लाल झंडे से भगवा वस्त्र तक — बदला सिर्फ़ रास्ता, सवाल वही रहा। ‘विचारों का विद्रोह’ उसी सवाल का लेखा-जोखा है।
उद्धरण — छापने लायक़
- जब तक समाज में अंतिम व्यक्ति सम्मानपूर्वक नहीं जीता, तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा।
- विचार ही वास्तविक क्रांति है।
- जब तक समाज में अंतिम व्यक्ति सम्मानपूर्वक नहीं जीता, तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा।
- जिस विचार से आप सवाल नहीं पूछ सकते, वह आपका विचार नहीं है। वह आपका मालिक है।
- आदमी सत्ता में पहुँचकर बदलता नहीं। सत्ता सिर्फ़ यह दिखा देती है कि वह असल में था क्या।
- आज़ादी झंडे से नहीं मिलती। वह उस खिड़की पर मिलती है जहाँ आम आदमी अपना काम कराने जाता है।
पुस्तक का ब्योरा
- शीर्षक
- विचारों का विद्रोह
- लेखक
- कामरेड स्वामी मदन अग्रवाल
- भाषा
- हिन्दी
- विस्तार
- 8 खंड · 48 अध्याय
- टेलीविज़न
- समाचार पत्र
- पत्रिकाएँ
- पॉडकास्ट
- साक्षात्कार
- डिजिटल मीडिया
- प्रेस विज्ञप्ति
- सार्वजनिक उपस्थिति
प्रेस किट
फ़ैक्टशीट
- नाम
- कामरेड स्वामी मदन अग्रवाल
- पहचान
- धर्मगुरु · आध्यात्मिक चिंतक · लेखक · समाजसेवी
- पुस्तक
- विचारों का विद्रोह — एक जीवन, एक संघर्ष, एक संकल्प
- आकार
- 218 पृष्ठ · 48 अध्याय
- प्रकाशन
- केआईयू पब्लिकेशन्स, यूएसए
संक्षिप्त परिचय
एक विचारक, समाजसेवी और परिवर्तन के लिए समर्पित कर्मयोगी। दशकों से समाज, राजनीति, न्याय, शिक्षा और मानवता के मुद्दों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं।
विस्तृत परिचय
पंद्रह की उम्र में उन्होंने भरी पंचायत में समाज के ठेकेदारों से कहा था कि आपके निर्णय चाँदी के जूते से प्रभावित होते हैं। बहिष्कार मिला, माफ़ी माँगने को कहा गया — बहिष्कार उन्होंने स्वीकार किया, माफ़ी नहीं माँगी। आपातकाल में फ़रार रहे, जनवादी युवा शक्ति के प्रदेशाध्यक्ष बने, अधिकारियों से रिश्वतें वापस दिलवाईं। फिर लाल झंडे से भगवा वस्त्र तक — बदला सिर्फ़ रास्ता, सवाल वही रहा। ‘विचारों का विद्रोह’ उसी सवाल का लेखा-जोखा है।

