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धर्मगुरु · आध्यात्मिक चिंतक · लेखक · समाजसेवी

कामरेड स्वामी मदन अग्रवाल

समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मान, समानता और न्याय की सोच को पहुँचाने की प्रतिबद्ध यात्रा।

उनके बारे में

पंद्रह की उम्र में उन्होंने भरी पंचायत में समाज के ठेकेदारों से कहा था कि आपके निर्णय चाँदी के जूते से प्रभावित होते हैं। बहिष्कार मिला, माफ़ी माँगने को कहा गया — बहिष्कार उन्होंने स्वीकार किया, माफ़ी नहीं माँगी। आपातकाल में फ़रार रहे, जनवादी युवा शक्ति के प्रदेशाध्यक्ष बने, अधिकारियों से रिश्वतें वापस दिलवाईं। फिर लाल झंडे से भगवा वस्त्र तक — बदला सिर्फ़ रास्ता, सवाल वही रहा। ‘विचारों का विद्रोह’ उसी सवाल का लेखा-जोखा है।

011956

गरोठ

जन्म 5 दिसंबर 1956 को गरोठ, ज़िला मंदसौर में। माता श्रीमती मेनाबाई, पिता श्री बद्रीलाल रम्मूजी। दादाजी मूल रूप से कोटपूतली, राजस्थान के थे — वहीं से आकर गरोठ में बस गए थे।

ग्यारहवीं तक गरोठ के सरकारी स्कूल में पढ़े। बी.कॉम और एम.बी.ए. की पढ़ाई घर रहकर की — सिर्फ़ परीक्षाएँ देकर।

पुरानी तस्वीर
पुरानी तस्वीर
02किताबें

मार्क्स, लेनिन, बुद्ध

बचपन से ही किताबें पढ़ने का शौक़ था। उसी दौरान कार्ल मार्क्स, लेनिन और बुद्ध का साहित्य पढ़ा, और कम्युनिज़्म से प्रभावित हुए। कम्युनिस्ट नेताओं के सम्पर्क में आए, और लोहिया-विचारकों के भी।

बाबा आमटे, गांधी और विनोबा के कई विचारों से भी वे प्रभावित रहे।

पढ़ते हुए
पढ़ते हुए
03पंद्रह की उम्र

भरी पंचायत में

समाज की शोषित व्यवस्था के ख़िलाफ़ वे बचपन से ही रहे। पंद्रह वर्ष की उम्र में समाज की पंचायत में एक निर्णय के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए।

उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया। माफ़ी माँगने को कहा गया। उन्होंने बहिष्कार स्वीकार किया — माफ़ी नहीं माँगी।

आपके निर्णय चाँदी के जूते से प्रभावित होते हैं।
041975

आपातकाल

आपातकाल लगने पर उनके मित्र और मार्गदर्शक कामरेड सी. एस. सुराना को, जन-समस्याएँ उठाने से नाराज़ प्रशासन ने गिरफ़्तार कर लिया। उसी दिन वे फ़रार हो गए।

पूरा आपातकाल उन्होंने फ़रारी में काटा — लहार, दतिया, रोन और गुना जैसे क़स्बों में। उसी दौरान जयप्रकाश नारायण की छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथियों से जुड़े, और उसमें सक्रिय हो गए।

05उसके बाद

जनवादी युवा शक्ति

आपातकाल के बाद श्री चंद्रजीत यादव ने कांग्रेस से अलग होकर जनवादी पार्टी बनाई। उसकी युवा शाखा — जनवादी युवा शक्ति — के वे मध्य प्रदेश प्रदेशाध्यक्ष बने। जन अदालत की तर्ज़ पर कई आम सभाएँ कीं।

नागदा के मज़दूर नेता एस. एन. पुरोहित और साथियों के साथ मिलकर गरोठ–भानपुरा क्षेत्र में अधिकारियों द्वारा ली गई रिश्वतें वापस दिलवाईं।

एक पुलिस अधिकारी की ज़्यादती के विरोध में साथियों के साथ मध्य प्रदेश विधानसभा की दर्शक-दीर्घा से पर्चे फेंककर नारे लगाए।

उपवास
उपवास
061984

बरात

उनका विवाह पिपरिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री राधाकृष्ण जी अग्रवाल की सुपुत्री श्रीमती विद्या अग्रवाल से हुआ।

जब वे अपनी ही बरात लेकर गए, तो साधारण कुर्ता-पाजामा में गए — जबकि सब बन-ठन कर गए थे। वहाँ देर तक असमंजस बना रहा। किसी ने उन्हें दूल्हा नहीं समझा; वेशभूषा के कारण लोग और-और लोगों को दूल्हा समझते रहे।

07फिर

लाल से भगवा

लाल झंडे से भगवा वस्त्र तक — बदला सिर्फ़ रास्ता। सवाल वही रहा।

उनके लेखन का केंद्र एक ही आग्रह है: मानिए मत, जाँचिए। यही आग्रह उनके अध्यात्म में है, उनकी समाजसेवा में है, और उनकी पुस्तक के हर अध्याय में।

मेरी आग बुझी नहीं। उसका रुख़ बदल गया।
नदी किनारे
नदी किनारे

चार यात्राएँ

एक जीवन, चार दिशाएँ

  • अध्यात्म

    धर्म संगठन है, अध्यात्म अकेली यात्रा। उनका झगड़ा ईश्वर से नहीं, ठेकेदारी से रहा है।

  • विचार

    “जिस विचार से आप सवाल नहीं पूछ सकते, वह आपका विचार नहीं है। वह आपका मालिक है।”

  • साहित्य

    अड़तालीस अध्यायों की एक पुस्तक, जो जवाब नहीं — सवाल छोड़कर जाती है।

  • सेवा

    किसी भी काम की पहली कसौटी एक ही — क्या वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता है।

आध्यात्मिक यात्रा

मेरी आग बुझी नहीं। उसका रुख़ बदल गया।

लोग पूछते हैं — एक कामरेड अध्यात्म तक कैसे पहुँच गया? उनका जवाब है कि सवाल ही ग़लत है। स्वामी होना उनके लिए संसार से भागना नहीं था; वह संसार को एक नई आँख से देखना था।

जीवन यात्रा

11 पड़ाव, एक ही सवाल

पूरी यात्रा