अध्यात्म
आध्यात्मिक दर्शन
बाहर की क्रांति अधूरी है, जब तक भीतर कुछ नहीं बदलता।
लोग पूछते हैं — एक कामरेड अध्यात्म तक कैसे पहुँच गया? उनका जवाब है कि सवाल ही ग़लत है। सही सवाल यह है कि एक कामरेड अध्यात्म तक क्यों नहीं पहुँचेगा।
अगर आप सचमुच मनुष्य को समझना चाहते हैं, तो उसकी बाहर की दुनिया के साथ-साथ उसके भीतर की दुनिया में भी उतरना पड़ेगा। ग़रीबी बाहर है — लेकिन लालच कहाँ है? शोषण बाहर है — लेकिन अहंकार कहाँ है? हिंसा बाहर है — लेकिन क्रोध कहाँ है? व्यवस्था बाहर है — लेकिन उसे चलाने वाला आदमी कहाँ से आता है?
हर सवाल का एक ही जवाब है — मनुष्य के भीतर से। इसीलिए उन्हें लगा कि बाहर की क्रांति अधूरी है। जब तक चेतना नहीं बदलेगी, क्रांति हर बार पुराने चेहरों के साथ लौटती रहेगी।
मेरी आग बुझी नहीं। उसका रुख़ बदल गया।