अध्यात्म
धर्म
झगड़ा ईश्वर से नहीं, ठेकेदारों से।
उनके लेखन में धर्म और अध्यात्म दो अलग चीज़ें हैं। धर्म संगठन है — उसके नियम हैं, पद हैं, ठेकेदार हैं। अध्यात्म अकेली यात्रा है, जिसमें कोई बीच में नहीं आता।
उनकी सबसे तीखी आलोचना उन लोगों पर है जो धर्म के नाम पर डर बेचते हैं। और उतनी ही तीखी उस आदत पर, जिसमें हम ग्रंथों को पढ़ते नहीं, पूजते हैं — क्योंकि पूजा किसी बात से बचने का सबसे सुरक्षित तरीक़ा है।
दिखावे के धर्म पर उनका एक पूरा अध्याय है। उनका आग्रह है कि परंपरा को बचाना ग़लत नहीं — ग़लत यह है कि हम खोल बचा रहे हैं और भीतर जो बीज था, उसे कब का फेंक चुके हैं।
मेरा झगड़ा ईश्वर से नहीं, ठेकेदारों से है।