अध्यात्म
जीवन और अध्यात्म
योग, भोग और मोक्ष — जवानी में ही।
उनका आग्रह है कि अध्यात्म बुढ़ापे की चीज़ नहीं है। योग, भोग और मोक्ष — तीनों जवानी में ही समझ लेने की बातें हैं, बाद के लिए बचाकर रखने की नहीं।
मृत्यु पर उनका रुख़ सीधा है — मौत से डर नहीं लगता, अधूरेपन से लगता है। जो काम रह जाते हैं, वे समय की कमी से नहीं रहते; वे इसलिए रहते हैं कि हम उन्हें कल पर टालते रहे, यह मानकर कि कल ज़रूर आएगा।
स्वर्ग-नरक को वे पुराना लालच और पुराना डर कहते हैं। और उनकी सबसे व्यावहारिक सलाह भी यहीं है — जिससे माफ़ी माँगनी है, माँग लीजिए; जिसे माफ़ करना है, कर दीजिए; जिससे बात बंद है, एक बार फ़ोन कर लीजिए।
मौत से डर नहीं लगता, अधूरेपन से लगता है।