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अध्यात्म

साधना

अकेले होने से मत डरो।

उनकी साधना की समझ भीड़ से दूर है। अकेलापन उनके लिए सज़ा नहीं — वह वही जगह है जहाँ आदमी अपने भीतर बैठे डर, लालच, अहंकार और क्रोध से आमने-सामने होता है।

पुस्तक का पहला ही खंड इसी को समर्पित है — “भीतर बैठा दुश्मन”। छह अध्याय, छह भीतरी शत्रु: डर, लालच, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और अकेलेपन का भय।

उनकी बात सीधी है — भीड़ के सामने क्रांति का नारा लगाना आसान है; आईने के सामने खड़े होकर सच बोलना मुश्किल।

सबसे ख़तरनाक ग़ुलामी वह विचार है जिसे हम अपना समझते हैं — और जिसने हमें सोचना बंद करा दिया है। उस जेल की सलाखें दिखाई नहीं देतीं, और क़ैदी ख़ुद उसका पहरेदार होता है।
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