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विचारों का विद्रोह — आवरण

विचारों का विद्रोह

एक जीवन, एक संघर्ष, एक संकल्प

मुझसे सहमत होने की कोशिश न करें। मुझसे लड़िए।

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पुस्तक के बारे में

यह पुस्तक कामरेड स्वामी मदन अग्रवाल जी के विचारों, अनुभवों और संघर्षों की प्रेरणादायक यात्रा है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी है जो समाज को बेहतर, न्यायसंगत और समान बनाने के लिए जीवनभर समर्पित रही।

समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, संस्कृति और मानवता से जुड़े प्रश्नों पर उनके स्पष्ट, साहसी और विचारोत्तेजक लेखन हमें सोचने, सवाल करने और बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाने की प्रेरणा देता है।

लेखक की अपनी बात

यह किताब मेरे जीवन का हिसाब-किताब है। यह मेरे पुरस्कारों की सूची नहीं है। यह मेरी उपलब्धियों का स्मारक नहीं है। यह उन विचारों की आग है जिन्हें मैंने जिया, परखा, बदला — और ज़रूरत पड़ने पर तोड़ भी दिया।

हर अध्याय का ढाँचा

बात, स्वीकारोक्ति, और दो सवाल

  1. एक

    बात

    वे अपना तर्क सीधे और बिना लाग-लपेट के रखते हैं।

  2. दो

    “अब अपनी बात”

    वे अपनी ही एक भूल स्वीकार करते हैं। यही किताब को उपदेश बनने से बचाता है।

  3. तीन

    दो सवाल

    अंत में पाठक के लिए दो सवाल — जिनके जवाब किताब में नहीं हैं।

अनुक्रमणिका

8 खंड, 48 अध्याय

खंड एक

भीतर बैठा दुश्मन

डर, लालच, अहंकार, क्रोध — बाहर की हर व्यवस्था यहीं से शुरू होती है।

  • डर
  • लालच
  • अहंकार
  • क्रोध
  • ईर्ष्या
  • अकेलापन
  1. 01डर बिकता है, और हम सब ख़रीदार हैंपृ. 15
  2. 02लालच डरे हुए अमीर की बीमारी हैपृ. 19
  3. 03अहंकार कमज़ोर आदमी का हथियार हैपृ. 23
  4. 04जो क्रोध नहीं करता, वह कायर होता हैपृ. 27
  5. 05ईर्ष्या: तुम अपने झूठ से हारते होपृ. 31
  6. 06अकेले होने से मत डरोपृ. 35

खंड दो

प्रेम के नाम पर क़ब्ज़ा

विवाह, परिवार, अपेक्षा — जहाँ सबसे ज़्यादा प्रेम है, वहीं सबसे ज़्यादा क़ब्ज़ा भी।

  • विवाह
  • प्रेम
  • अपेक्षा
  • संतान
  • स्त्री
  • दोस्ती
  1. 07विवाह निभाया जाता है, पाया नहीं जातापृ. 41
  2. 08ट्रेन का सफ़र — मुसाफ़िर आते-जाते हैंपृ. 45
  3. 09माता-पिता की अपेक्षा — मीठी हिंसापृ. 49
  4. 10जिनके लिए पाप कर रहे होपृ. 53
  5. 11पाप वह नहीं, जो दिखाई देता हैपृ. 57
  6. 12जो सामने हाँ कहे, वह दरबारी हैपृ. 61

खंड तीन

समाज का नंगा सच

जाति, ग़रीबी, पैसा, स्कूल, परंपरा, भीड़ — वे सच जो सब जानते हैं, कोई कहता नहीं।

  • जाति
  • ग़रीबी
  • पैसा
  • शिक्षा
  • परंपरा
  • भीड़
  1. 13जाति मरी नहीं — उसने सूट पहन लियापृ. 67
  2. 14ग़रीबी भाग्य नहीं, इंतज़ाम हैपृ. 71
  3. 15पैसा गंदा नहीं, पैसे का डर गंदा हैपृ. 75
  4. 16स्कूल ने नौकर बनाया, इंसान नहींपृ. 79
  5. 17हर परंपरा के पीछे एक कारण थापृ. 83
  6. 18भीड़ के पास चेहरा है, दिमाग़ नहींपृ. 87

खंड चार

सत्ता का चरित्र

कम्युनिज़्म ने आँख दी, फिर सवाल छीनने चाहे। यह खंड लेखक का अपना हिसाब है।

  • वामपंथ
  • विचारधारा की सीमा
  • सत्ता
  • क्रांति
  • धर्म के ठेकेदार
  • असहमति
  1. 19कम्युनिज़्म ने मुझे आँख दीपृ. 93
  2. 20और उसी ने मुझसे सवाल छीनने चाहेपृ. 97
  3. 21सत्ता का कोई रंग नहीं — भूख होती हैपृ. 101
  4. 22हर क्रांति अपने ही बच्चे खाती हैपृ. 105
  5. 23जिस दिन विचार भगवान बन जाएपृ. 109
  6. 24असहमति की क़ीमत — मैंने क्या खोयापृ. 113

खंड पाँच

धर्म, मृत्यु, मुक्ति

झगड़ा ईश्वर से नहीं, ठेकेदारों से है। धर्म संगठन है; अध्यात्म अकेली यात्रा।

  • धर्म बनाम अध्यात्म
  • ठेकेदार
  • गुरु
  • कर्म
  • योग-भोग-मोक्ष
  • युवाओं के नाम
  1. 25धर्म संगठन है, अध्यात्म अकेली यात्रापृ. 119
  2. 26मेरा झगड़ा ईश्वर से नहीं, ठेकेदारों सेपृ. 123
  3. 27सच्चा गुरु अपने से आज़ाद कर देता हैपृ. 127
  4. 28सृष्टि का एक संविधान हैपृ. 131
  5. 29योग, भोग और मोक्ष — जवानी में हीपृ. 135
  6. 30युवाओं के नामपृ. 139

खंड छह

आज की दुनिया

मोबाइल, सफलता, वृद्धाश्रम, दिखावा, पर्यावरण — आज के सवाल, सीधे।

  • मोबाइल
  • सफलता
  • वृद्धाश्रम
  • पाखंड
  • दिखावा
  • प्रकृति
  1. 31मोबाइल ने जोड़ा नहीं, बाँट दियापृ. 145
  2. 32सफलता किसकी परिभाषा से तय होगीपृ. 149
  3. 33वृद्धाश्रम में बैठे लोगों से एक बातपृ. 153
  4. 34शराब पीकर चुप बैठा आदमीपृ. 157
  5. 35दिखावे का धर्म, दिखावे का समाजपृ. 161
  6. 36पेड़ काटने वाला दोषी, चुप रहने वाला भीपृ. 165

खंड सात

मृत्यु और उसके बाद

स्वर्ग-नरक, कर्म, श्राद्ध — पुराने लालच और पुराने डर की जाँच।

  • मौत का डर
  • स्वर्ग-नरक
  • कर्मों का खाता
  • खुली जेल
  • श्राद्ध
  • जो बचता है
  1. 37मौत से डर नहीं, अधूरेपन से लगता हैपृ. 171
  2. 38स्वर्ग-नरक: पुराना लालच, पुराना डरपृ. 175
  3. 39पिछले कर्मों का खातापृ. 179
  4. 40पृथ्वी एक खुली जेल हैपृ. 183
  5. 41श्राद्ध किसके लिए — उनके, या हमारे?पृ. 187
  6. 42मरने के बाद आदमी का क्या बचता हैपृ. 191

खंड आठ

विरासत और आख़िरी बात

पाँच बड़ी ग़लतियाँ, जो अधूरा रह गया, और आख़िरी बात — बिना सार, बिना उपदेश।

  • असली चोर
  • चुप्पी
  • सवाल का सलीक़ा
  • ग़लतियाँ
  • जो अधूरा
  • आख़िरी बात
  1. 43आदमी आज़ाद पैदा होता है, बोझ लेकर मरता हैपृ. 197
  2. 44असली चोर कौन है?पृ. 201
  3. 45सवाल पूछने का सलीक़ापृ. 205
  4. 46मेरी पाँच बड़ी ग़लतियाँपृ. 209
  5. 47जो अधूरा रह गयापृ. 213
  6. 48आख़िरी बातपृ. 217

चुना हुआ अंश

प्रवेश — मैं असहमत हूँ

पुस्तक का प्रवेश, पूरा — सत्तर साल बाद लिखी गई वह भूमिका जिसमें वे अपनी पूरी यात्रा का हिसाब देते हैं।

पुस्तक की यात्रा

  1. जल्द आ रही है

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  4. अमेज़न पर

  5. पुस्तक भंडारों में

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