सत्तर साल जी लेने के बाद आदमी के पास सिर्फ़ दो रास्ते बचते हैं। या तो वह चुप हो जाए और कह दे— “बहुत देख लिया। अब क्या कहना।” या फिर वह पीछे मुड़े, अपनी पूरी ज़िंदगी की आँखों में आँखें डाले और कहे— “जो देखा है, उसे कहे बिना मर जाना बेईमानी होगी।”
मैंने दूसरा रास्ता चुना है। क्योंकि चुप्पी भी एक तरह की मौत है। और मैं दो बार मरने को तैयार नहीं हूँ।
यह किताब मेरी कहानी सुनाने के लिए नहीं है। यह मेरी सफ़ाई नहीं है। यह मेरे जीवन का महिमामंडन तो बिल्कुल नहीं है। मैंने यह क़लम इसलिए उठाई है क्योंकि मेरे भीतर कुछ सवाल आज भी ज़िंदा हैं। और कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो उम्र के साथ मरते नहीं। वे और नुकीले हो जाते हैं।
जिस सवाल ने मुझे तोड़ा
एक दौर था जब मैंने कामरेड बनकर दुनिया को देखा। मैंने क्रांति के सपने देखे। समानता की बात की। व्यवस्था की जड़ें हिलाना चाहा। शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। मैंने माना कि समाज को बदलना चाहिए।
फिर उम्र मुझे एक ऐसे सवाल के सामने लाकर खड़ा कर गई, जिससे मैं आज तक भाग नहीं पाया— “समाज बदलने निकले थे। क्या इंसान बदला?” और उससे भी तीखा सवाल— “जिस व्यवस्था से तुम लड़ रहे हो, कहीं उसका एक छोटा-सा टुकड़ा तुम्हारे भीतर भी तो नहीं बैठा है?”
यह सवाल मुझे कई रातें जगाता रहा। क्योंकि दूसरों को ग़लत साबित करना आसान है। अपने भीतर झाँकना सबसे कठिन। भीड़ के सामने क्रांति का नारा लगाना आसान है। आईने के सामने खड़े होकर सच बोलना मुश्किल।
मैंने अपने ही विश्वास तोड़े
मैंने ज़िंदगी में कई विचार अपनाए। लेकिन किसी विचार को भगवान नहीं बनाया। क्योंकि विचार अगर रास्ता दिखाए—तो वह दर्शन है। और वही विचार अगर सवाल करने से रोक दे—तो वह विचारधारा नहीं, ज़ंजीर है।
मैंने कम्युनिज़्म पढ़ा। उससे बहुत कुछ सीखा। उसने मुझे अमीर और ग़रीब के बीच की खाई देखने की नज़र दी। उसने मुझे बताया कि शोषण कोई हादसा नहीं होता—वह एक बनाई हुई व्यवस्था होती है। उसने मुझे यह मानने से रोका कि आदमी की भूख उसका भाग्य है।
लेकिन समय ने मुझे एक और सच दिखाया— कोई भी विचारधारा मनुष्य से बड़ी नहीं हो सकती। मनुष्य विचारधारा के लिए नहीं है। विचारधारा मनुष्य के लिए है।
जिस दिन कोई विचार आपसे आपकी सोचने की आज़ादी माँगने लगे, उस दिन उस विचार से भी सवाल करना चाहिए। मैंने यही किया। इसीलिए मेरी यात्रा सीधी रेखा में नहीं चली। मैंने रास्ते बदले। लेकिन सवाल नहीं बदले।
मेरी असली लड़ाई किससे थी
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो साफ़ दिखाई देता है— मेरी लड़ाई किसी एक सरकार से नहीं थी। किसी एक पार्टी से नहीं थी। किसी एक धर्म से नहीं थी। किसी एक व्यवस्था से भी नहीं थी।
मेरी लड़ाई थी— मनुष्य को छोटा बनाने वाली हर सोच से। वह सोच राजनीति में हो, धर्म में हो, समाज में हो, परिवार में हो—या मेरे अपने भीतर हो।
जहाँ किसी से उसकी सोचने की आज़ादी छीनी गई, मैंने सवाल किया। जहाँ किसी को सिर्फ़ इसलिए छोटा समझा गया क्योंकि वह ग़रीब था, मैंने सवाल किया। जहाँ धर्म के नाम पर डर बेचा गया, मैंने सवाल किया। जहाँ राजनीति के नाम पर अंधभक्ति माँगी गई, मैंने सवाल किया। और जहाँ मैंने ख़ुद को सही मानकर दूसरों को ग़लत ठहराया—वहाँ ज़िंदगी ने मुझसे सवाल किया।
सवाल करना मेरी आदत नहीं रहा। सवाल करना मेरा स्वभाव बन गया।
फिर अध्यात्म आया
लोग पूछते हैं—एक कामरेड अध्यात्म तक कैसे पहुँच गया? मुझे लगता है, सवाल ही ग़लत है। सही सवाल यह है—एक कामरेड अध्यात्म तक क्यों नहीं पहुँचेगा?
अगर आप सचमुच मनुष्य को समझना चाहते हैं, तो उसकी बाहर की दुनिया के साथ-साथ उसके भीतर की दुनिया में भी उतरना पड़ेगा। ग़रीबी बाहर है। लेकिन लालच कहाँ है? शोषण बाहर है। लेकिन अहंकार कहाँ है? हिंसा बाहर है। लेकिन क्रोध कहाँ है? व्यवस्था बाहर है। लेकिन उसे चलाने वाला आदमी कहाँ से आता है? हर सवाल का एक ही जवाब है—मनुष्य के भीतर से।
एक ज़ुल्म हटाकर दूसरा ज़ुल्म बिठा देना क्रांति नहीं है। वह सिर्फ़ पहरेदार बदलना है।
मैं स्वामी कैसे बना
यह सवाल मुझसे पूछा जाना चाहिए। और मैं इसका जवाब किसी चमत्कार की कहानी बनाकर नहीं दूँगा। न कोई रोशनी उतरी। न कोई आवाज़ आई। न कोई सपना आया। मैंने किसी एक दिन अचानक संसार नहीं छोड़ा।
मेरे लिए स्वामी होना संसार से भागना नहीं था। मेरे लिए स्वामी होना संसार को एक नई आँख से देखना था। मेरी आग बुझी नहीं। उसका रुख़ बदल गया।
पहले मैं व्यवस्था से लड़ता था। अब मैं उस मानसिकता से लड़ता हूँ जो व्यवस्था को जन्म देती है। पहले मैं शोषण के ख़िलाफ़ बोलता था। अब मैं उस लालच को समझना चाहता हूँ जो शोषण को पैदा करता है। पहले मैं समाज को बदलना चाहता था। अब मैं मनुष्य को समझना चाहता हूँ। यह पलायन नहीं था। यह मेरी क्रांति का अगला चरण था।
सत्तर साल बाद
आज जब मैं अपनी ज़िंदगी को पीछे से देखता हूँ, तो सबसे पहले मुझे मेरी सफलताएँ दिखाई नहीं देतीं। मुझे मेरी ग़लतियाँ दिखाई देती हैं। वे फ़ैसले, जिन्हें मैं आज दूसरे ढंग से लेता। वे लोग, जिन्हें मैं शायद बेहतर समझ सकता था। वे विचार, जिन्हें मैंने कभी अंतिम सत्य मान लिया था। और वे मौक़े, जब मुझे बोलना चाहिए था—और मैं चुप रह गया।
मेरी सबसे बड़ी ग़लतियाँ वे नहीं थीं जो मैंने कीं। मेरी सबसे बड़ी ग़लतियाँ वे चुप्पियाँ थीं जो मैंने ओढ़ लीं।
उम्र ने मुझे एक बात ज़रूर सिखाई है— सत्य किसी की जागीर नहीं है। न मेरी। न आपकी। न किसी पार्टी की। न किसी धर्म की। न किसी किताब की। सत्य ख़रीदा नहीं जाता। विरासत में नहीं मिलता। उसे खोजना पड़ता है। और उस खोज में सबसे ज़रूरी चीज़ है—अपने ही विश्वास पर शक करने का साहस।
इसलिए यह किताब
यह किताब मेरे जीवन का हिसाब-किताब है। यह मेरे पुरस्कारों की सूची नहीं है। यह मेरी उपलब्धियों का स्मारक नहीं है। यह उन विचारों की आग है जिन्हें मैंने जिया, परखा, बदला—और ज़रूरत पड़ने पर तोड़ भी दिया।
मैं चाहता हूँ कि इसे पढ़ते हुए आप मुझसे सहमत होने की कोशिश न करें। मुझसे लड़िए। मेरे विचारों को चुनौती दीजिए। मेरे निष्कर्षों को कठघरे में खड़ा कीजिए।
लेकिन सबसे ज़रूरी बात— अपने भीतर बैठे उन विचारों से सवाल कीजिए, जिन्हें आपने आज तक जाँचा ही नहीं। क्योंकि मेरी नज़र में सबसे ख़तरनाक ग़ुलामी जेल की दीवारों में नहीं होती।
सबसे ख़तरनाक ग़ुलामी वह विचार है जिसे हम अपना समझते हैं—और जिसने हमें सोचना बंद करा दिया है। उस जेल की सलाखें दिखाई नहीं देतीं। और क़ैदी ख़ुद उसका पहरेदार होता है।
मैंने सत्तर साल से ज़्यादा जी लिया है। बहुत कुछ देखा। बहुत कुछ माना। बहुत कुछ छोड़ा। बहुत कुछ खोया। बहुत कुछ पाया। लेकिन आज भी कोई पूछे—“आपकी सबसे बड़ी पहचान क्या है?” तो मेरा जवाब वही रहेगा—
मैं वह आदमी हूँ जिसने सवाल पूछना नहीं छोड़ा। और जब तक एक भी सवाल ज़िंदा है— क्रांति ज़िंदा है।