जीवन यात्रा
“मैंने रास्ते बदले। लेकिन सवाल नहीं बदले।”
नीचे के पड़ाव उनकी अपनी लिखी बातों से बने हैं। जिन वर्षों की पुष्टि नहीं है, वे जानबूझकर ख़ाली छोड़े गए हैं — कोई तिथि गढ़ी नहीं गई।
1956
जन्म — गरोठ, ज़िला मंदसौर

5 दिसंबर 1956 को गरोठ, ज़िला मंदसौर में जन्म। माता श्रीमती मेनाबाई, पिता श्री बद्रीलाल रम्मूजी। दादाजी मूल रूप से कोटपूतली, राजस्थान के रहने वाले थे — वहीं से आकर गरोठ में बस गए थे।
वर्ष अपुष्ट
पढ़ाई — और किताबों का शौक़
ग्यारहवीं तक गरोठ के सरकारी स्कूल में। बी.कॉम और एम.बी.ए. की पढ़ाई घर रहकर की — परीक्षाएँ देकर। बचपन से ही किताबें पढ़ने का शौक़ था। उसी दौरान कार्ल मार्क्स, लेनिन और बुद्ध का साहित्य पढ़ा, और कम्युनिज़्म से प्रभावित हुए। कम्युनिस्ट नेताओं के सम्पर्क में आए, और लोहिया-विचारकों के भी।
वर्ष अपुष्ट
पंद्रह की उम्र — और बहिष्कार
समाज की शोषित व्यवस्था के ख़िलाफ़ वे बचपन से ही रहे। पंद्रह वर्ष की उम्र में समाज की पंचायत में एक निर्णय के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए, और भरी पंचायत में समाज के ठेकेदारों से कहा कि आपके निर्णय चाँदी के जूते से प्रभावित होते हैं। उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया गया। माफ़ी माँगने को कहा गया। उन्होंने बहिष्कार स्वीकार किया — माफ़ी नहीं माँगी।
1975
आपातकाल — और फ़रारी के वर्ष
1975 में देश में आपातकाल लगने पर, मित्र एवं तत्कालीन मार्गदर्शक कामरेड सी. एस. सुराना को जन-समस्याएँ उठाने से नाराज़ प्रशासन ने गिरफ़्तार कर लिया। उसी दिन वे फ़रार हो गए। पूरे आपातकाल का समय उन्होंने फ़रारी में काटा — लहार, दतिया, रोन और गुना जैसे क़स्बों और शहरों में। उसी दौरान जयप्रकाश नारायण द्वारा बनाई गई छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथियों के सम्पर्क में आए, और उसमें सक्रिय हो गए।
वर्ष अपुष्ट
जनवादी युवा शक्ति — प्रदेशाध्यक्ष
आपातकाल के बाद कांग्रेस नेता और केंद्रीय मंत्री श्री चंद्रजीत यादव ने कांग्रेस से अलग होकर जनवादी पार्टी बनाई। उसकी युवा शाखा — जनवादी युवा शक्ति — का मध्य प्रदेश प्रदेशाध्यक्ष उन्हें बनाया गया। जन अदालत की तर्ज़ पर उन्होंने कई आम सभाएँ कीं।
वर्ष अपुष्ट
गरोठ–भानपुरा — रिश्वतें वापस
नागदा के तत्कालीन मज़दूर नेता एस. एन. पुरोहित और अन्य साथियों के साथ मिलकर, गरोठ–भानपुरा के क्षेत्र में अधिकारियों द्वारा ली गई रिश्वतें वापस दिलवाईं।
1984
विवाह — साधारण कुर्ता-पाजामा में
उनका विवाह पिपरिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री राधाकृष्ण जी अग्रवाल की सुपुत्री श्रीमती विद्या अग्रवाल से हुआ। 1984 में जब वे अपने विवाह में बरात लेकर गए, तो केवल साधारण कुर्ता-पाजामा में गए — जबकि सभी बराती बन-ठन कर गए थे। वहाँ बड़ी असमंजस की स्थिति बनती रही; किसी ने उन्हें दूल्हा नहीं समझा, और वेशभूषा के कारण लोग और-और लोगों को दूल्हा समझते रहे।
वर्ष अपुष्ट
विचारों का विद्रोह
आठ खंड, अड़तालीस अध्याय। हर अध्याय के अंत में दो सवाल — जिनका जवाब किताब नहीं देती।
भरना बाक़ीप्रकाशन वर्ष और प्रकाशक की पुष्टि बाक़ी है।
संपादक के लिए